नैनीताल : विवाह के समय युवक की उम्र 21 वर्ष से कम होने मामले में जोड़े को सुरक्षा देने मामले में सुनवाई की.
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने विवाहित जोड़े को सुरक्षा प्रदान करने को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई की. कोर्ट ने यह आदेश उस आपत्ति के बाद दिया की विवाह के समय युवक की उम्र 21 वर्ष से कम है. कोर्ट ने कहा कि परामर्शदाता की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि युवती अपने माता-पिता के साथ जाने को इच्छुक नहीं है और वह अपने पति के साथ खुश है. ऐसे में शादीशुदा जोड़ा सर्वोच्च न्यायलय के आदेश के आधार पर सुरक्षा पाने का हकदार है.

मीडिया में छपी ख़बर के मुताबिक़, उत्तराखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ती आलोक महरा की एकलपीठ ने यह आदेश दिया. याचिका में पुलिस को निजी पक्षकारों और उनके सहयोगियों से दोनों याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा देने की मांग की गई. याचिकाकर्ताओं ने सुनवाई के दौरन कोर्ट को बताया कि उन्होंने 24 मार्च 2026 को विवाह किया था. हाईस्कूल प्रमाणपत्र के अनुसार विवाह के समय युवती की उम्र 19 वर्ष 6 माह थी, जबकि युवक 20 वर्ष का था. याचिका में कहा गया कि युवती के परिवार के सदस्य इस विवाह के खिलाफ हैं और दोनों को जान से मारने की धमकियां दे रहे हैं. इसी कारण उन्हें अपने जीवन और सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरे की आशंका है. इससे पहले कोर्ट ने दोनों पक्षों को परामर्शदाता के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया.
परामर्शदाता की रिपोर्ट में कहा गया कि युवती अपने माता-पिता के साथ नहीं जाना चाहती और वह युवक के साथ रहकर खुश है. जबकि पक्षकारों की ओर से कहा कि विवाह के समय युवक ने 21 वर्ष की आयु पूरी नहीं की थी, इसलिए यह विवाह वैध नहीं माना जा सकता. वहीं, याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यदि विवाह के समय युवक की आयु 21 वर्ष से कम थी तब भी अधिकतम यह विवाह निरस्तीकरण योग्य हो सकता है, लेकिन केवल इसी आधार पर उन्हें सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता. जब उन्हें लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हो. “परामर्शदाता की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता युवती अपने माता-पिता के साथ जाने को तैयार नहीं है और वह याचिकाकर्ता युवक के साथ खुश है. सुप्रीम कोर्ट के लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में दिए गए निर्णय को देखते हुए याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा दिए जाने का मामला बनता है.
रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने संबंधित थाना प्रभारी को निर्देश दिया कि वह दोनों की सुरक्षा को लेकर खतरे का आकलन करें और यदि जीवन या शारीरिक सुरक्षा पर खतरा पाया जाता है तो आवश्यक पुलिस संरक्षण उपलब्ध कराया जाए. साथ ही हाईकोर्ट ने थाना प्रभारी को यह भी निर्देश दिया कि वह युवती के परिवार और विवाह का विरोध करने वाले अन्य लोगों को बुलाकर कानून के अनुसार उनकी काउंसलिंग करें.

